सत्यार्चन

जीवन, जीवंत जीने जागरूकता जरूरी है!!!

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कलाकार की व्यथा

Posted On: 10 Feb, 2016 Hindi Sahitya में

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कलाकार की व्यथा
मैं,
एक मूर्तिकार
अनगढ़ को आकार देता हूँ
पत्थरों में जीवन भरता हूँ मैं
वर्षों से….
मेरे स्पर्श से
निर्जीव निराकार पत्थर
स्वरूप पाते हैं
स्वर पाते हैं
जी उठते हैं
और पूछते हैं मुझसे
क्यों दिया है मंने
उन्हें यह स्वरूप,
स्वर
भावनायें
क्यों किया उन्हें जीवंत
वे थे सुखी
रह भावहीन!!!
मैंने छीना है उनसे
उनकी अलौकिकता का आनंद!!!
#सत्यार्चन

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SathyArchan के द्वारा
May 4, 2016

माननीय माथुर जी; परिवार की दाल रोटी व्यवस्था में गहन व्यस्तता वश प्रत्युत्तर में अत्यधिक देरी के लिये क्षमा चाहता हूँ! आपका धन्यावाद् ! साधुवाद ! भावी सहयोग आकांक्षित ….! #सत्यार्चन

Jitendra Mathur के द्वारा
February 25, 2016

मन की गहनता को स्पर्श कर लिया आपकी इस छोटी-सी कविता ने । इसकी प्रशंसा के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं मेरे पास ।

SathyArchan के द्वारा
February 13, 2016

माननीय मेंदीरत्ता जी, इस सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार की प्रतिक्रिया पाकर अविभूत  हूँ… धन्यवाद..

bhagwandassmendiratta के द्वारा
February 11, 2016

सत्यार्चन जी सुन्दर रचना है | भाव विहीन होने में सुख है ये दर्शाती हुई आपकी की कविता फिर भी भावों से भरी है| बहुत बहुत साधुवाद| आपकी इसी कविता की वजह से मैंने आपके पहले वाले पोस्ट को भी खोजा|


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