सत्यार्चन

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प्रधानमंत्री अब तक और माननीय मोदी जी...

Posted On: 11 Feb, 2016 Junction Forum,Celebrity Writer में

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प्रधानमंत्री अब तक और माननीय मोदी जी…

भारतीय स्वतंत्रता की तीन चौथाई सदी बीतने को है
स्वतंत्रता का अर्थ तो था अपनों का शासन किन्तु
अपने शासकों के लिए भी शायद आदर्श शासक अंग्रेज ही थे!
तभी ‘अपने शामक’ अंग्रेजों की बिना कोई दलील दिए
बलात्कार जैसी शासन पद्धति को जरा सा परिष्कृत कर
दलीलों के साथ भावनात्मक बलात्कार युक्त नीतियां लागू करने लगे!
लोक तंत्रीय व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रुटि खुद लोकतंत्र ही है
जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों जनता को लुभाने में ही लगे रहते हैं!
स्वतंत्रता प्राप्ति से ही सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों पूर्ण स्वार्थ-चिंतक रहे,
दोनों ने ही भारत की जनता को छलने में कोई कसर नहीं छोड़ी,
जब-जब जो-जो भी सत्तासीन रहा हो
विपक्ष ने हर जन हितकारी नीति का भी केवल विरोध ही किया!
यानी विपक्ष का अर्थ ‘केवल विरोध’ की परंपरा को जन्म हमारे देश में ही दिया गया!!!
सत्तापक्ष ने भी विपक्ष के बहुमूल्य से बहुमूल्य प्रस्ताव को ‘केवल नकारकर’ ऐसा ही किया!
सत्ता-पक्ष/ विपक्ष एक दूसरे के प्रस्ताव मानने से
संभावित राजनैतिक क्षति की आशंका से सदा ग्रसित रहे!
इसी कारण ऐसा करने से बचते रहे!
जबकि चुनावी समर कभी नीति आधारित रहा ही नहीं!
तीसरे चौथे आम चुनाव से ही यह
दुष्प्रचार और प्रलोभनों के स्तर के अनुरूप परिणाम देता आया है!
बड़े-बड़े लुभावने राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध किए गए वादों ने
चुनावों के परिणाम प्रभावित किए हैं…
जैसे एक आम चुनाव में
- किसी भी जमीन पर छप्पर तान लो अधिकार / पट्टा हम देंगे (बस वोट हमें दो!),
- अगले चुनाव में – बिना मीटर की असीमित बिजली जलाओ (बस वोट हमें दो!),
एक और चुनाव में- बैंकों का कर्ज मत चुकाओ हम चुकायेंगे! (बस वोट हमें दो!)
ः- बाहरी लोगों को कमाने राज्य में नहीं घुसने देंगे! (बस हमें वोट दो!)
- कितना भी बड़ा अपराध कर दिया हो अपने राज्य के गृहमंत्री के बंगले में शरण पाओ! (बस सपोर्ट उन्हें दो!)
और नवीनतम
– चावल २/- 1/- रु. किलो लो (बस वोट हमें दो)
- बिजली-पानी का बिल मत चुकाओ हम चुकायेंगे! (बस हमें वोट दो!)
- परिवार के महीने भर के राशन मुफ्त लो (बस हमें वोट दो!)

और अधिक आरक्षण का प्रसाद बांटने, राम-मंदिर निर्माण के नाम पर भड़काने जैसी
अनेक अनैतिक कृत्यों की लंबी सूची है जो चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही…
आश्चर्य है चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और सी ए जी जैसी
संस्थाओं की नाक के नीचे यह अनैतिकता फलते-फूलते रही !

इसके दुष्परिणामों में से एक
-”नैतिकता के मायने बदल कर बलवान की बात” हो गई!
बाहु बलियों / दबंगों में स्वार्थ सिद्धि के लिए अनैतिक आव्हानों की होड़ लग गई!
यह सब कुछ उस सरकारी खजाने से होता रहा
जिसे चंद ईमानदार (विवश???) मध्य वर्गीय करदाता कर चुकाकर भरते रहे!
(बड़े उद्योगपतियों द्वारा चुकाये जाने वाले कर कहीं से अधिक उनकी कर्ज चूक है जो उनकी घाटे वाली कंपनियां को सरकारी बैंकों से प्राप्त है जो आम जनता के द्वारा वैंकों में जमा कराये धन से दिये गये हैं! )

कम पड़ा तो राष्ट्रवासियों के सर पर अंतर्राष्ट्रीय कर्ज लाद दिया गया!
जब-जब सत्तापक्ष बहुमत सक्षम यानी सशक्त बड़े बहुमत के साथ जीत कर आया है…
वह राष्ट्र-हितैषी/ जन हितकारी / जन विरोधी/ स्वार्थ-परक सभी तरह के
निर्णय बलात्कार की तरह लागू कराने में भी सफल रहा है!
इनमें आपरेशन ब्लू स्टार, कम्प्यूटरीकरण, प्रधानमंत्री सड़क, स्कूल चलें हम, बोफो्र्स, कोलगेट जैसे निर्णय शामिल हैं।

प्रारंभ से ही राष्ट्राध्यक्षों की प्रबल लोकप्रियता ने उनके राष्ट्र-हित के आव्हानों को फलीभूत भी कराया है
जनता ने अनेक आव्हानों का ‘हार्दिक अनुपालन’ कर बहुत बड़ा योगदान दिया है !!!
किन्तु समय के साथ विपक्ष की “बहुमुखी” सक्रियता
और राजनेताओं की पुनः राष्ट्र को दरकिनार कर पूर्ण स्वार्थ परक छिछली शासन की पद्धति ने
राष्ट्रीय नेताओं की लोकप्रियता को धरती पर ला पटका!
कहते हैं नेहरू जी, सरदार पटेल जी ही नहीं
उस समय के हर एक मंत्रि को रेडियो पर बोलते सुनने काम छोड़कर लोग रेडियो के पास जुट जाते थे!
शास्त्री जी के ‘जय जवान जय किसान’ ने कृषि-क्रांति ही ला दी!
किंतु इंदिरा जी के शासन काल में सर्वाधिक लोकप्रिय से शुरू कर लोकप्रियता ग्राफ सर्वाधिक नकारात्मक की ओर भी चला गया!
विपक्ष का सम्मान औक विपक्ष की परंपरागत विपक्षी परिपाटी दोनों का चरम इंदिरा जी के ही मध्य और अंतिम दिनों में दिखा!!
जब इंदिरा जी ने विपक्ष यू एन ओ में भारत का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व नेता प्रतिपक्ष अटल जी को सोंपा बाद में इंदिरा जी ने विपक्ष को पूरी तरह नकारा आपात्काल और सेसरशिप लगा समूचे विपक्ष को मौन या जेल में रहने विवश कर दिया
जिसके कारण अगले आमचुनाव में तत्कालीन विपक्ष सत्तासीन हुआ
किन्तु विपक्ष में रहते नेतागण जिन नीतियों का प्रबल विरोध करते रहे्
सत्ता में आते ही उन्हीं को जस का तस या तनिक रूपांतरण कर अपनाने का कार्य भी करते रहे!
शायद यह भी कारण रहा होगा कि सर्वाधिक लोकप्रिय विपक्षी नेता माननीय अटल जी सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्राध्यक्ष ना बन सके !
अब तक तो यही निरंतर जारी रहा है!!!
वर्तमान सरकार को तौलने के लिए साल दो साल का पैमाना ठीक नहीं है!
किन्तु माननीय मोदीजी की प्रधानमंत्री के रूप में विदेश यात्राओं केआशा से बहुत अधिक सुपरिणाम,
माननीय के हाल के “अद्भुत आव्हानों” में से
स्वच्छता अभियान, सब्सिडी छोड़ो अभियान , आदि को मिला जनसमर्थन
और आशा से बहुत अधिक सुखद परिणति
लोकप्रिय राष्ट्र नायकों के युग की वापसी की सकारात्मक आस जगाती है!
माननीय का सबसे महत्वपूर्ण गुण है
मूल्यवान सुझाव पर विचार, ना कि सुझाव किसका है
जैसे ‘सब्सिडी छोड़ो आव्हान’ करने के अनुरोध का मेरा सुझाव था!

किन्तु उनकी ही एक उद्घोषणा “ना खाऊंगा ना खाने दूँगा” चिंता भी जगाती है
क्योंकि अब तक के पूर्व प्रधानमंत्रियों में से एक मात्र सबसे क्रांतिकारी दृष्टिकोण के धनी,
कंप्यूटरीकरण जैसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले,
सबसे सफेद कालर वाले राजीव गाँधी को ही
दलाली के दाग सहित स्वर्गीय भी होना पड़ा था!
राजीव जी, मनमोहन जी के अतिरिक्त अन्य किसी पूर्व प्रधान मंत्री पर
भ्रष्टाचार का प्रकरण न्यायालय तक नहीं गया !
अभी-अभी बिहार विधानसभा में भा ज पा की हार
मोदी जी के बढ़ते कद में सफल रोक का स्वयं भाजपाई सहयोगी संगठनों के अंतर्विरोध स्वरूप समक्ष है!

मोदी जी की अपने साथियों और कर्मचारियों से एक और अपेक्षा है कि
“राजनीति को (नौकरी को भी) सेवा समझें व्यवसाय नहीं”
माननीय आप ऐसा कर सकते ही नहीं हैं… कर भी रहे हैं …
क्योंकि आपका अपना निजी परिवार नहीं है…
बहुत पहले से आपने अपना परिवार पूरे देश को मान लिया है…
इस तरह तो आपकी ही तरह आपके सांसदों,
मंत्रियों और सभी शासकीय कर्मचारियों को परिजनों का त्याग करना होगा…
तभी तो वे निष्काम कर्म में रत हो पायेंगे!!!
माननीय को अपने साथियों, सहयोगियों पर विश्वास होगा…
किन्तु… क्या वे केवल माननीय के स्वर्णिम भारत के दिवा स्वप्न के लिए ही
उनके आव्हान पर संत बन पायेंगे
क्योंकिसाधु हुए बिना प्रत्येक सांसद द्वारा चुनावी संग्राम में आहूत किए कई-कई करोड़ भूलने वे कैसे तत्पर होंगे?

या क्या उनका दल ही उनकी सरकार के 292 सांसदों की संख्या तक पहुँचाने के लिए
किए गए दलीय खर्च मात्र बिसारने तैयार होगा ?
मात्र मीडिया पर प्रचार, विज्ञापन छपाई, पोस्टर वितरण आदि की व्यवस्था और चुनावी हवाई यात्राओं के केवल ये तीन ही खर्चो, (प्रायोजित को मिलाकर क्योंकि प्रायोजक भी लाभांश के लिये ही करता है), के जोड़ का अनुमान
जो पार्टी के 292 सांसदों के पूरे 5 साल में प्राप्त होने वाले वेतन भत्तों के सकल योग से भी कहीं अधिक होगा,
इस खर्च को दल निष्काम हो भूलने तत्पर होगा???
क्यों होगा??????

यदि वास्तव में ऐसा हो सकता है तो निश्चय ही

भारत अगले मात्र 5 वर्ष में ही दुनिया का सिरमौर होगा!!!

किन्तु यदि इनके ऐसे निष्कामी होने में जरा भी संदेह है तो

ऐसे चुनावी खर्चो की आवश्यकता ही ना रहे ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होगा!

राजनीति को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाना होगा!

राजनीति को अछूत से नैतिक व्यवसाय के रूप में स्वीकारना और निखारना होगा!

मोदी जी आप जो वर्तमान भारतीय जन-जन की आशा के श्रोत हैं
आस्था का केंद्र बनते जा रहे हैं…
स्वयं ही बड़े खतरों से घिरे हैं…
आपके साथ-साथ भारत का भविष्य भी खतरे में ही है!
आप भारतीय प्रधानमंत्री पद के गौरव के अनुरूप जनप्रिय हैं…
आपके जनसाधारण से किए आव्हान के सुखद परिणामों का प्रमाण भारत जन देख चुके हैं !
आपके पास बहुत बड़ा बहुमत है!
आपसे लोक लुभावन के साथ-साथ राष्ट्र वादी निर्णयों की भी अपेक्षा है!
शायद आप मानेंगे कि झुग्गियों के पट्टे पाने वाले, कर्ज माफी पाने वाले बीस साल बाद भी वहीं हैं जहां थे…
अगले अनुदान की प्रतीक्षा में…
आपको इन याचकों को स्वावलंबी बनाना होगा…
आपको आवश्यक होने पर कम्प्यूटरीकरण
(जो उस समय बलात्कारी प्रस्ताव माना गया था!)
जैसे प्रस्तावों को लाने की भी आवश्यकता रहेगी!
अंत में सभी पाठकों से क्षमा!
क्योंकि हर पाठक कहीं ना कहीं असहमत हो आक्रोश में आया होगा
किन्तु यह केवल एक वैचारिक मंथन था!
आपको यहां लाकर मेरे देखे जा सके यथार्थ के
दर्शन कराने के विगत वर्षों से प्रयास चल रहे हैं!
मैं नहीं कहता हर जगह आप सहमत ही हों किन्तु
निष्पक्षता से विचारें अवश्य

महान विचारक ‘कापर निकष’ का कथन था कि
“जो मैं कह रहा हूँ उसपर विश्वास मत करो शक करो, समझो, तौलो, फिर अपनाओ या कूड़े में डालो”

अस्तु… पुनश्च क्षमा!

-#सत्यार्चन
#SathyArchan
#SatyArchan-
हिन्दी दिवस -14 सितम्बर 2014
(संशोधन शरद् पूर्णिमा 08 अक्तूबर 2014, बसंत पंचमी – १२ फरबरी 2016)



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SathyArchan के द्वारा
May 4, 2016

माननीय माथुर जी; परिवार की दाल रोटी व्यवस्था में गहन व्यस्तता वश प्रत्युत्तर में अत्यधिक देरी के लिये क्षमा चाहता हूँ! आपका धन्यावाद् ! साधुवाद ! भावी सहयोग आकांक्षित ….! #सत्यार्चन

Jitendra Mathur के द्वारा
February 25, 2016

बिलकुल सच कहा है आपने । काश माननीय प्रधानमंत्री जी इस पर ग़ौर करें !


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