सत्यार्चन

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लोकतंत्र पर विचारयज्ञ अपेक्षित है- Junction Forum

Posted On: 16 Aug, 2016 Junction Forum,Celebrity Writer में

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-लोकतंत्र पर विचारयज्ञ अपेक्षित है-

15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता के मायने, जो जी चाहे, गुन्डई, दबंगई, चोरी-लूट, बलात्कार जैसा घृणित ही सही, करके प्रसिद्धि पाना फिर राजनीतिज्ञ बनकर भ्रष्टाचार करने, और अंग्रेजों से बड़े अत्याचारी होने का अधिकार पाना ही दिखा ! तत्कालीन समदर्श सक्षम बड़े और बच्चों को भी! ऐसे बच्चे बड़े बूढ़े भी हुए , उनकी अगली पीढ़ियाॅ भी आईं और गईं किन्तु लोकतंत्र की परिभाषा उस समय के बच्चों की समझ से भिन्न प्रदर्शित होते आज भी नहीं दिखती ! 'टाइम ट्रेवल के दौरान मुझ लेखक से, ऐसे ही एक बच्चे के ज्वलंत प्रश्नों ने, मेरी लेखनी में आग भर दी जो यहाँ निकालने का प्रयास किया है ! शायद आपको इस आग से आनन्द या पीड़ा हो ! यही लेखक का उद्देश्य है!
वो बच्चा अपने दोस्तों के साथ बड़ा हुआ तो उसका नाम जयप्रकाश नारायण पता लगा!
उस बच्चे के काका विनोबा भावे, रवीन्द्र नाथ टैगौर, महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, श्या. प्र. मुखर्जी वगैरह थे!
जे पी और उसके दोस्त बड़े होने तक लोकतंत्र की उनकी परिभाषा को सबको बताते रहे और लोकतंत्र के साथ साथ कानूनी अनुपालन पर विचार करते रहे!
जे पी की बड़ी बात थी सबने बहुत तारीफ की, कई लोग साथ आ गये, बड़ा हंगामा हुआ, बड़ी पार्टी बनी, लोकतंत्र था देश पर सो राज भी पा लिया!
जे पी भी गाँधी, विनोबा, भीष्म पितामह के त्यागी आदर्शों से प्रेरित होकर सत्तासंचालन से दूर रह , विनोबा, गाँधी, भीष्म की तरह लाचार, बाहर से सिंहासन के विरोध के परित्याग की वचनबद्धता सहित, केवल समर्थन के अधिकार लेकर, दुखी मन से एक दिन दुनियाॅ छोड़ गये!
आज, भीष्म पाप के पक्षधर होकर भी देवतुल्य हैं, गाँधी न्याय के पक्षधर रहकर भी अन्याय के दोषी ठहराये जाकर वर्तमान में गंधासुर पुकारे जाते हैं!
जिनका “महान पराक्रमी संत गोडसे जी’ ने वध कर, समाज को, ‘गंधासुर के कपटी कलापों’ से मुक्त करने का ‘त्यागमयी’ जौहर दिखाया !
जे पी कम दुर्भाग्यशाली थे! उनके स्वर्ग सिधारते ही उनके नेतृत्व में सत्ताशीन होने वालों ने केवल उनके नाम को बंदरबांट किया!
मन ही मन जे पी पर हॅसते ;’अनुयायियों’; ने अपने-अपने दल बनाकर पुनः सत्तालोलुपता में जे पी के केवल नाम की ही मिट्टी पलीद की है!
उस बच्चे, जे पी के दोस्तों की अगली पीढ़ियों में से दो चार लोग आज भी लोकतंत्र की वास्तविक परिभाषानुसार, लोकतंत्र का सुधारा रूप प्रदर्शित करने के प्रयास को सक्रिय हैं! व्यस्त हैं!
इनमें अन्नाजी, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय, कुमार विस्वास, योगेन्द्र यादव, मनोहर पर्रीकर, ममता, कविता कृष्णन, अलका लाम्बा, दुर्गाशक्ति नागपाल, राधेश्याम जुलानियां, सुनील जोशी, सत्यार्चन जैसे नाम न्यूनाधिक चर्चा में हैं! रहेंगे! इनमें से भी अधिकांश सेटल हो गये या कर लिये गये! जो आज भी सेटल ना हो सके शायद आगे हो जायें ! अन्यथा लोकतंत्र की परिभाषा सुधारने सुधारने की जिद पर अडिग रहे तो वे आगे या तो गंधासुर जैसे किसी नाम के अधिकारी होंगे या ज्यादा से ज्यादा, जेपी जैसे इनके भी नाम का दुरुपयोग ही होना है!
निराशावादी नहीं हूँ किन्तु श्री राम से लेकर विवेकानंद तक आदर्शों के नाम की दुर्दशा का दर्शक होने के बाद अगले 100 साल तो अवश्य शेष दिखते हैं समग्र “जन जन जागरण” को !
मैंने अंतःचेतना की प्रेरणा से 1994 में एक स्थान से जन जागरण का प्रारंभ किया किन्तु प्रधान गुरुवर के पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन तक अन्य दायित्व निर्वहन को अनुचित सिद्ध करने के उपरांत वह स्थान छोड़ प्रथम दायित्व निर्वहन में रत हूँ (१०-11 माह में ही गुरुवर के आदेश से मुक्त होने वाला हूँ! ) तीन चार साल बाद उस स्थान की ओर जाना हुआ तो वही दुखद स्थिति थी लोग मेरी तस्वीर की पूजा आरती में व्यस्त थे ! मेरे संदेश/ निर्देश के विपरीत! सोये हुईं को जगाया तो जा सकता है ! किन्तु केवल तभी जब वो स्वयं जागने की इच्छा रखे!
हमारा सामाजिक परिवेश जागरण की बात करने वाले दाभोलकर को जीवित रहने देना तक सहन नहीं कर पाता !
मेरे मत में राम सिर्फ पूजन के अधिकारी बन सके, विवेकानंद अगरबत्ती के ! साॅई बाबा की तो पूजन पर भी विवाद है!
हम, हमारे लोग राम, विवेकानंद, सॅई बाबा आदि की पूजा के लिए / पूजा के अधिकार के लिए / उनके मंदिर निर्माण के लिए तो बड़े-बड़े संघर्ष और आन्दोलन तक में आहूत होने तत्पर हैं! किन्तु वे जिस कारण से , जिन आदर्शों की स्थापना के कारण पूजने योग्य हुए उनपर चलने /उनके अनुसरण के विचार मात्र से भी दूरी बनाये हुए हैं! इसीलिए इन सबके बिचोलियों / अनधिकृत पुजारियों के बहकाबे में आकर के केवल बिचोलियों के हित साधक बने हुए हैं! ना धर्म का हित सध रहा है ना याचक का! हरेक को अपने अपने आराध्य के आदर्शों से लाखों गुना अधिक श्रद्धा, स्वार्थी तत्वों द्वारा मिथ्याचारित उनके चमत्कारों में है!
हर कोई आडम्बर युक्त चमत्कारों के धनी / बाजीगरों के सामने, अपने हित साधन की चमत्कारी पूर्ति को, सर्वश्व न्यौछावर करने तो तत्पर रहते हैं! विद्वानों के पथ प्रदर्शन में स्वयं संघर्ष से पाने को गिने चुने ही तत्पर होते हैं!
स्वामी विवेकानंद को विस्तार से जानने के बाद निराश होना स्वाभाविक था! पहले मैं बहुत उत्साहित था अपने तर्काधारित, नमोन्मेषी, राजनैतिक/ सामाजिक के साथ धार्मिक विचार जो थे मेरे पास ! विवेकानंद जी को पढ़ने पर उत्साह शून्यता आने लगी ! स्वामी जी 125 साल पहले ही, मेरे पास के अधिकांश नवोन्मेषी धार्मिक विचार रख चुके थे! वे केवल विदेशियों के ही हित साधक बन सके ! जिनने उनके विचारों पर निर्निमेष अनुसंधान कर अनुसरण किया ! हमारे तत्कालीन लोगों ने या तो उनका विरोध/ बहिष्कार किया या उनकी पूजा करने लगे !दोनों ही तरह से, विवेकानंद के मातृभूमि कोन समर्पित, महानतम विचार, जो मानवता को मूल्यवान देन होकर भी, मातृभूमि के लिए अधिकांशतः जाया ही हुए !
विवेकानंद सहित, इतिहास में स्थापित महामानवों के विचारों को जानते जाने के साथ दिन पर दिन निराशा बढ़ते जाती है ! हम पूजने से अनुसरण की ओर तत्पर होते दिखाई ही नहीं पड़ते !
'गीता' की अतिशय पवित्रता का प्रचार केवल भारतीयों को ही गीतोपदेश से ही वंचित करता आया है!विदेशी और विधर्मी ही लाभान्वित हो रहे हैं!
शायद अधिकांश लोगों में स्वयं विचारने की, वैचारिक अनुसंधान की, विचार की क्षमता ही नहीं है!
हर एक का कोई ना कोई आराध्य पथप्रदर्शक है, जो उनके लिए, विचारने का कार्य करता है! नियुक्त विचारक ही सही गलत निर्धारित कर उन्हें बताया करता है! ठीक इस्लामी फतवा व्यवस्था की तरह!!!
किन्तु अब विचारों पर विचार सामयिक अवश्यंभावी हो चुका है!
अब तो विचार यज्ञ अपेक्षित है!
#सत्यार्चन



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